द मीडिया टाइम्स डेस्क
पटना, 18 मई : फर्जी डिग्री के आधार पर वर्षों से कार्यरत जीएनएम (जनरल नर्सिंग एंड मिडवाइफरी) कर्मियों पर एफआईआर दर्ज होने के बाद भी उनके तबादले के आदेश ने बिहार के स्वास्थ्य विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इस पूरे मामले ने न सिर्फ मुंगेर बल्कि पूरे सूबे में विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार, स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी तबादला सूची में करीब 100 जीएनएम के नाम शामिल हैं, जिनमें से लगभग 20 ऐसे कर्मी हैं जिन पर फर्जी डिग्री के आरोप में मुंगेर के विभिन्न प्रखंडों में एफआईआर दर्ज की जा चुकी है। हैरानी की बात यह है कि इन मामलों के सामने आने के बावजूद इनका तबादला किया गया।
विभाग की ओर से जारी आदेश में सरकार के अपर सचिव मृणायक दास के हस्ताक्षर हैं। आदेश की प्रति सिविल सर्जन (सीएस), प्राचार्य, अधीक्षक, उपाधीक्षक, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी समेत अन्य वरीय अधिकारियों को भेजी गई थी। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बिना पूरी विभागीय प्रक्रिया के किसी का तबादला संभव है?
नियमों के अनुसार, किसी भी कर्मी के तबादले के लिए संबंधित प्रभारी और सिविल सर्जन के माध्यम से आवेदन और अनुशंसा आवश्यक होती है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि किसी भी जीएनएम ने व्यक्तिगत स्तर पर अपना तबादला नहीं कराया होगा, बल्कि पूरी प्रक्रिया विभागीय स्तर पर ही पूरी की गई होगी।
धरहरा प्रखंड का मामला सबसे ज्यादा चर्चा में है, जहां सात जीएनएम के खिलाफ फर्जी डिग्री का केस दर्ज है। इनमें से तीन का नाम तबादला सूची में शामिल है। इतना ही नहीं, एक आरोपी जीएनएम को सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) का प्रभार भी सौंपा गया था, जबकि सरवेज आलम को इमरजेंसी विभाग जैसी अहम जिम्मेदारी दी गई थी।
वहीं, अमित मांझी जैसे कर्मियों की अस्पताल प्रशासन के साथ गहरी पैठ की भी चर्चा है। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. अविनाश कुमार ने आरोपियों के खिलाफ सर्टिफिकेट केस दर्ज कर वेतन वसूली की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब आरोपी कोर्ट में पेश हो रहे थे, तब इसकी जानकारी विभाग या वर्तमान सिविल सर्जन डॉ. राजू कुमार को क्यों नहीं दी गई?
और भी चौंकाने वाली बात यह है कि जनवरी 2025 में एफआईआर दर्ज होने के बावजूद 28 मार्च 2026 को तबादला सूची को रद्द करने का आदेश जारी किया गया। इसके बाद इन कर्मियों को उनके मूल स्थान पर वापस लौटने का निर्देश दिया गया, लेकिन क्या फर्जी डिग्री वाले सभी कर्मी वास्तव में अपने मूल पदस्थापन स्थल पर लौटे—इस पर अब भी संशय बना हुआ है।
पूरे मामले में विभाग और जिला स्तर के अधिकारियों के बीच समन्वय की कमी साफ नजर आ रही है। अब देखना होगा कि इस विवाद के बाद स्वास्थ्य विभाग क्या कार्रवाई करता है और जिम्मेदारों पर कब तक गाज गिरती है।
