नासिर खान , द मिडिया टाइम्स
इस बार के बजट से किसी बड़े पॉजिटिव सरप्राइज की उम्मीद पहले से ही कम थी, लेकिन जो नहीं सोचा था, वह नेगेटिव सरप्राइज ज़रूर मिल गया। इसका असर तुरंत शेयर बाज़ार में दिखा। बजट वाले दिन जहाँ आमतौर पर बाज़ार 1–2 प्रतिशत ऊपर-नीचे होता है, वहीं इस बार बाज़ार करीब ढाई प्रतिशत टूट गया और एक ही दिन में लगभग ₹10 लाख करोड़ की मार्केट वैल्यू साफ हो गई। संकेत साफ हैं कि आने वाले दिनों में बाज़ार पर दबाव बना रह सकता है।
बाज़ार की इस नाराज़गी के पीछे तीन बड़े कारण हैं।
पहला: F&O में STT की बढ़ोतरी
सरकार ने Futures और Options में Securities Transaction Tax (STT) बढ़ा दिया। Futures में टैक्स 150% और Options में 50% तक बढ़ाया गया। यह फैसला अप्रत्याशित था, क्योंकि इंडस्ट्री टैक्स घटाने की मांग कर रही थी। हालांकि आम निवेशकों के लिए यह नुकसानदेह नहीं है। सच्चाई यह है कि F&O एक तरह का शुद्ध सट्टा है, जिसमें 90–95% ट्रेडर लगातार पैसा गंवाते हैं। इस फैसले से असली चोट ब्रोकरेज, एक्सचेंज और मार्केट इकोसिस्टम को लगी है, इसलिए बाज़ार की प्रतिक्रिया इतनी तीखी रही।
दूसरा: शेयर बायबैक पर टैक्स नियमों में बदलाव
अब शेयर बायबैक को डिविडेंड इनकम की बजाय कैपिटल गेन माना जाएगा। इसका सीधा असर प्रमोटर्स पर पड़ेगा, जबकि छोटे निवेशकों को इससे अपेक्षाकृत फायदा ही होगा। लेकिन बाज़ार की चिंता आम निवेशकों से ज़्यादा बड़े खिलाड़ियों को लेकर होती है। यही वजह है कि इस फैसले को भी बाज़ार ने नकारात्मक रूप में लिया।
तीसरा: SGB पर टैक्स का लूपहोल बंद
अगर Sovereign Gold Bond RBI से नहीं, बल्कि सेकेंडरी मार्केट से खरीदा गया है, तो अब उस पर कैपिटल गेन टैक्स देना होगा। यह एक पुराना लूपहोल था, जिसे सरकार ने अब जाकर बंद किया है। हैरानी इस बात की है कि जब SGB की नई सीरीज़ आनी ही बंद हो चुकी है, तब जाकर सरकार को यह खामी दिखाई दी।
STT और बाज़ार की गिरावट का रिश्ता
STT की शुरुआत 2004 में हुई थी, तब यह वादा किया गया था कि इसके बदले शेयरों पर LTCG नहीं लगेगा। 2018 में LTCG वापस आया और 2024 में इसे 12.5% कर दिया गया। अब STT भी बढ़ा दिया गया है। सरकार का तर्क है कि भारत में डेरिवेटिव ट्रेडिंग GDP से कई गुना ज़्यादा हो चुकी है और सट्टेबाजी पर लगाम लगाना ज़रूरी है। मंशा सही हो सकती है, लेकिन टाइमिंग ने बाज़ार का मूड बिगाड़ दिया है।
बजट का फाइन प्रिंट
बजट के आँकड़े बताते हैं कि सरकार ने खर्चों में कटौती करके राजकोषीय घाटे को काबू में रखा है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, ग्रामीण विकास, सामाजिक कल्याण और पेयजल जैसी अहम योजनाओं में कटौती हुई है। 4.4% का फिस्कल डेफिसिट अपने आप में उपलब्धि नहीं कहा जा सकता, अगर वह ज़रूरी खर्च घटाकर हासिल किया गया हो।कोविड के बाद सरकार अपने लगभग सारे विकल्प आज़मा चुकी है—कैपेक्स बढ़ाना, टैक्स घटाना, GST में राहत देना। इसके बावजूद अर्थव्यवस्था में सुस्ती बनी हुई है। अब शायद ज़रूरत है कि महँगाई को थोड़ा खुलने दिया जाए और RBI को अपनी भूमिका निभाने दी जाए। अगर नॉमिनल GDP और कॉरपोरेट कमाई रफ्तार पकड़ती है, तभी बाज़ार में दोबारा जान आ सकती है।

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