यूपी में 75 साल की सियासत: 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री, 23 साल सत्ता, फिर 32 साल का वनवास|

जानिए उत्तर प्रदेश में किस जाति के कितने मुख्यमंत्री बने

उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। आज भले ही ब्राह्मण राजनीति के केंद्र में न दिखें, लेकिन राज्य के 75 साल के इतिहास पर नजर डालें तो तस्वीर काफी अलग नजर आती है।

🔹 ब्राह्मण मुख्यमंत्री: संख्या ज्यादा, लेकिन सत्ता से दूर

उत्तर प्रदेश में अब तक 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री रहे हैं, जिन्होंने कुल मिलाकर लगभग 23 साल तक राज्य की कमान संभाली। इनमें प्रमुख नाम रहे:

  • गोविंद बल्लभ पंत

  • कमलापति त्रिपाठी

  • हेमवती नंदन बहुगुणा

  • नारायण दत्त तिवारी

  • बनारसी दास

  • श्रीपति मिश्रा

हालांकि, 1993 के बाद से कोई भी ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बन पाया, यानी ब्राह्मण समाज करीब 32 साल से सत्ता के शिखर से दूर है।

🔹 ठाकुर (राजपूत): कम समय, लेकिन अहम भूमिका

ठाकुर समुदाय से भी उत्तर प्रदेश को मुख्यमंत्री मिले, जिनमें शामिल हैं:

  • वीर बहादुर सिंह

  • कल्याण सिंह (कुछ लोग उन्हें ओबीसी लोध मानते हैं, लेकिन राजपूत राजनीति से भी जोड़ा जाता है)

वर्तमान दौर में ठाकुर राजनीति को योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व से नई धार मिली है, जिन्होंने लगातार दो कार्यकाल पूरे किए।

🔹 ओबीसी राजनीति का उदय

1990 के बाद यूपी की राजनीति में ओबीसी वर्ग का दबदबा बढ़ा। इस वर्ग से प्रमुख मुख्यमंत्री रहे:

  • मुलायम सिंह यादव

  • अखिलेश यादव

  • चौधरी चरण सिंह (संक्षिप्त कार्यकाल)

मंडल राजनीति के बाद ओबीसी नेतृत्व यूपी की सत्ता का स्थायी चेहरा बन गया।

🔹 दलित राजनीति और मायावती

दलित समाज से मायावती यूपी की सबसे प्रभावशाली मुख्यमंत्री रहीं। उन्होंने:

  • चार बार मुख्यमंत्री पद संभाला

  • सबसे लंबा दलित नेतृत्व वाला शासन दिया

उनका कार्यकाल सामाजिक न्याय और प्रतीकात्मक राजनीति के लिए जाना जाता है।

🔹 बनिया और अन्य वर्ग

  • सुचेता कृपलानी (बनिया समुदाय) यूपी की पहली महिला मुख्यमंत्री रहीं

  • कुछ मुख्यमंत्री ऐसे भी रहे जिनका कार्यकाल बहुत छोटा रहा, लेकिन उन्होंने राजनीतिक संतुलन में भूमिका निभाई

🔹 आज की राजनीति में जातीय गणित

आज उत्तर प्रदेश की राजनीति में:

  • ब्राह्मण समाज प्रभावशाली तो है, लेकिन सत्ता से बाहर

  • ओबीसी और ठाकुर नेतृत्व केंद्र में

  • दलित राजनीति का असर घटा है, पर पूरी तरह खत्म नहीं

राजनीतिक दल लगातार जातीय संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना हर वर्ग के लिए समान नहीं रहा।

निष्कर्ष

उत्तर प्रदेश की 75 साल की राजनीति बताती है कि सत्ता स्थायी नहीं होती, और जो वर्ग एक दौर में केंद्र में होता है, वह दूसरे दौर में हाशिये पर भी जा सकता है। ब्राह्मण समाज इसका सबसे बड़ा उदाहरण है—जहां संख्या और अनुभव होने के बावजूद पिछले तीन दशकों से सत्ता की कुर्सी दूर है।

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